श्राद्ध विधि – आसान गाइड
श्रीमान या श्रीमती जब अपने पिता‑माता या दादा‑दादी को याद करते हैं, तो कई लोग श्राध्व करके उनका सम्मान करते हैं. इस रिवाज में कुछ खास चीज़ें होती हैं—समय, सामग्री और कदम. अगर आप पहली बार कर रहे हैं तो डरने की ज़रूरत नहीं, नीचे सभी बातों को आसान भाषा में बताया गया है.
श्राध्व का सही समय
सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि श्रध्व कब करना चाहिए. आमतौर पर दिवंगत के मृत्यु के दसवें दिन (दशमी) से शुरू होता है और पंद्रहवीं या तेरहवीं रात तक चलता है. अगर कोई विशेष तिथि नहीं मिलती, तो वार्षिक शराद्ध भी कर सकते हैं। महाव्रत वाले महीने—जैसे कार्तिक या फाल्गुन में यह ज्यादा मान्य माना जाता है। लेकिन सबसे अहम बात ये है कि परिवार के सभी सदस्य एक साथ हों और मन से श्रद्धा हो.
श्राध्व के मुख्य चरण
1. साफ‑सफाई: घर का आंगन, पूजा स्थल और बर्तन साफ करें। पवित्र वस्तु जैसे कागज़ या कपड़ा पर भोजन रखें.
2. पानी और कलश: दो घड़े में पानी भरें—एक कलश के लिए और दूसरा पीने वाले को। कलश को हवन की आग के पास रखें.
3. तर्पण: पाणि, दही, शहद और कुटी (गुड़) का तर्पण करें। इसे धीरे‑धीरे चक्र में घुमाते हुए अन्नज्योति को जलाएं.
4. पादुका या धूप: अगर आप पादुका नहीं रखते तो धूप जलाई जा सकती है. यह आत्मा को शांति देता है.
5. भोग और परोपकार: दाने, फल, मिठाई तैयार रखें। इन्हें पहले अन्नज्योति के आगे रखकर भोग दें। बाद में गरीबों या पास के मंदिर में वितरित करें.
6. आरती और प्रार्थना: अंत में दो बार आरती करें और मन से शांति की कामना करें.
इन कदमों को क्रमवार करने पर श्रध्व सही तरीके से पूरा हो जाता है। अगर कोई चीज़ याद न रहे तो चिंता मत करो; आप बाद में भी जोड़ सकते हैं. सबसे जरूरी बात यह है कि दिल से श्रद्धा और कर्तव्य भाव रहे.
आधुनिक समय में लोग अक्सर इस रिवाज को सरल बनाते हैं—ऑनलाइन पवित्र ग्रन्थ पढ़ना, या वीडियो कॉल के ज़रिए दूर बैठे relatives को साथ लाना. ऐसा करने से भी शोक का बंधन मजबूत रहता है और परम्परा जारी रहती है.
अंत में एक छोटा सुझाव: श्रध्व के बाद परिवार में मिलकर कुछ हल्का भोजन करें या यादें शेयर करें। इससे दिल की बोझ कम होगी और आपस में समझ बढ़ेगी. अब जब आपको सारी जानकारी मिल गई, तो बिना डर के अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देना शुरू कर सकते हैं.

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