चिता स्थलांतरण – क्या है नया कदम?
आपने सुना होगा कि सरकार ने चिताओं को नए अभयारण्यों में ले जाने का फैसला किया है। ये सिर्फ एक ‘बदली’ नहीं, बल्कि इन तेज‑तर्रार शिकारियों की जिंदगियों बचाने के लिये जरूरी कदम है। आजकल जंगल घट रहे हैं, इंसान-जन्तु टकराव बढ़ रहा है और चिता जैसे बड़े कैटरपिलर को पर्याप्त जगह मिलना मुश्किल हो गया है। इसलिए वन्यजीव विभाग ने कुछ सुरक्षित क्षेत्रों में उनके लिए नई बस्ती बनानी शुरू कर दी है।
क्यों करना पड़ता है स्थलांतरण?
पहली बात तो यह है कि चिता का प्राकृतिक आवास धीरे‑धीरे खत्म हो रहा है। खेती, बुनियादी ढांचा और अनधिकृत वन कटाई के कारण उनके रहने की जगह कम होती जा रही है। दूसरा, कई बार लोग अपने खेतों में प्रवेश करके चिता को मार देते हैं या उनका शिकार करते हैं। इन कारणों से जनसंख्या घटती जा रही थी, इसलिए विशेषज्ञों ने कहा – अगर हम अभी कदम नहीं उठाएंगे तो भविष्य में इनके लिए कोई भी घर नहीं बचेगा।
स्थलांतरण का मतलब है चिता को एक सुरक्षित अभयारण्य से दूसरे बेहतर वातावरण वाले क्षेत्र में ले जाना, जहाँ उन्हें पर्याप्त शिकार मिल सके और इंसानों के साथ टकराव कम हो। इस प्रक्रिया में वन्यजीव वैज्ञानिकों, ट्रैकरों और डॉक्टर्स की टीम पूरी देखरेख करती है – दवा देना, स्वास्थ्य जांच करना और फिर धीरे‑धीरे नई जगह पर छोड़ना।
कौन से अभयारण्य तैयार हैं?
जिला कन्नौज (उत्तर प्रदेश) के बाघा राष्ट्रीय उद्यान में पहले ही दो चिताओं को सफलतापूर्वक स्थापित किया गया है। यहाँ घास‑भरी खुले मैदान और पानी की उपलब्धता उनके लिए आदर्श है। दक्षिण भारत में कर्नाटक के बन्यनवाली वाइल्डलाइफ सैंक्चर भी तैयार हो रहा है, जहाँ बड़े पैमाने पर प्रेक्षित शिकार (जैसे हिरण और बछड़े) रखे जाएंगे।
इन जगहों को चुनते समय तीन बातों का ख़ास ध्यान रखा गया: 1) पर्याप्त क्षेत्रफल – कम से कम 150 वर्ग किलोमीटर, 2) पानी के स्रोत की निकटता, 3) मानव बस्ती से दूरी (कम से कम 5 किमी)। जब ये शर्तें पूरी हो जाती हैं तो चिता को नई जगह पर छोड़ना सुरक्षित माना जाता है।
अब बात करते हैं चुनौतियों की। सबसे बड़ी समस्या है ट्रांसपोर्ट के दौरान तनाव – तेज़ गति वाले जानवरों को कार में रखना आसान नहीं होता। इसके लिए विशेष एयरोडायनामिक कंटेनर बनाए गए हैं, जो ध्वनि और कंपन कम रखते हैं। दूसरा मुद्दा है नई जगह पर शिकार की उपलब्धता। वन विभाग ने पहले से ही घास‑खुराक वाले प्रेते बनाकर रखे हैं ताकि चिता को खाना मिलने में देरी न हो। तीसरा – स्थानीय लोगों का सहयोग। कई बार गांववाले नई बस्ती के बारे में गलतफहमी रखते हैं, इसलिए सूचना अभियानों और आर्थिक लाभ (जैसे इको‑टूरिज़्म) से उनका भरोसा जीतना जरूरी है।
इन सभी कदमों के बावजूद सफलता की कहानियां भी सामने आ रही हैं। पिछले साल बघवली राष्ट्रीय उद्यान में दो युवा चिताओं को स्थानांतरित किया गया था, और अब वे 6 महीने में ही खुद शिकार करने लगे हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि सही योजना और निरंतर निगरानी से चिता का भविष्य सुरक्षित रखा जा सकता है।
आप भी इस प्रक्रिया में मदद कर सकते हैं – अगर आपके पास किसी अभयारण्य के निकट जमीन है तो वन विभाग को संपर्क करें, या सोशल मीडिया पर जागरूकता फैलाएं। छोटा‑छोटा कदम मिलकर बड़ी ताकत बनाते हैं और चिता जैसी खूबसूरत प्रजातियों को हमारे जंगलों में जीवित रख सकते हैं।

भारत ने चीता स्थानांतरण में सोमालिया, तंजानिया और सूडान से चीते लाने पर किया विचार
भारत ने अभी तक नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से चीता स्थानांतरण के चलते सामना कर रहे अनुकूलन चुनौतियों के मद्देनजर सोमालिया, तंजानिया और सूडान से चीते लाने पर विचार किया था। वर्तमान स्थानांतरण योजना में संदेह बरकरार है क्योंकि दक्षिण अफ्रीकी चीतों ने भारतीय जलवायु के साथ तालमेल बिठाने में कठिनाईयों का सामना किया है। इस प्रक्रिया में कई चीतों और शावकों की मृत्य होने के बाद विवाद खड़ा हो गया है।
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