संसद भवन में एक ऐसी तस्वीर देखने को मिली जो देश के लिए स्पष्ट संकेत थी। नरेंद्र मोदी, भारत के प्रधानमंत्री ने हाल ही में दी गई सदन में बयानबाजी के बाद रवैया बदलकर वार्तालाप पर ध्यान दिया। सर्वदलीय बैठकसंसद भवन परिसर 25 मार्च, 2026 की शाम को 5 बजे आयोजित हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य बढ़ते पश्चिम एशियाई संकट से निपटना था। इस बैठक में ऊर्जा सुरक्षा और गल्फ में मौजूद भारतीयों की जान बचाई जाए या नहीं, यही सबसे बड़ा सवाल था।
वास्तव में, मामला कुछ हल्का-फुल्का नहीं है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा उसी पड़ोस से लेता है जहां अभी तनाव फैला हुआ है। यदि वहां लड़ाई-जंग शुरू हो गया, तो भारतीय अर्थव्यवस्था सीधे दबेगी। इसलिए सरकार ने तय किया कि इस पर सिर्फ केंद्रीय मंत्रिमंडल ही नहीं, बल्कि विपक्ष की भी राय जरूरी है। यह एक राष्ट्रीय सहमति बनाने की कोशिश थी, ताकि कोई भी अंतरराष्ट्रीय घटना भारत को आश्चर्यचकित न कर सके।
बैठक की तैयारी और उपस्थिति
बैठक की अध्यक्षता राजनाथ सिंह, रक्षा मंत्री ने की। इसमें वरिष्ठ अधिकारियों का एक बड़ा समूह मौजूद था। भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करने वालों में गृह मंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू शामिल थे। विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने पूरी स्थिति पर ब्रीफिंग दी। वहीं, सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के दो-दो प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था।
लेकिन एक बड़ा सवाल उठा, क्या विपक्ष के नेता मौजूद थे? लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी नहीं आए। उनके न आने का कारण व्यक्तिगत और दुखद था - उनकी माँ सोनिया गांधी की तबीयत 24 मार्च की रात बिगड़ गई थी और उन्होंने अपना केरल दौरा रद्द करना पड़ा। इसके बजाय कांग्रेस का प्रतिनिधित्व तारिक अनवर और मुकुल वासनिक ने किया। मल्लिकार्जुन खरगे ने केरल दौरा पूरा करने के लिए समय निकाला।
ऊर्जा और सुरक्षा: मुख्य एजेंडा
बैठक का दिमाग कुछ ही मुद्दों पर चल रहा था। सबसे पहले यह सुनिश्चित करना कि पेट्रोल-डीजल और कच्चे तेल की आपूर्ति में कहीं भी बाधा न आए। पश्चिम एशिया (खासकर ईरान और इजराइल के बीच का तनाव) हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। प्रधानमंत्री ने बताया कि सरकार ने अब तक 7 अलग-अलग एंपावर्ड ग्रुप्स बनाए हैं। ये समूह लगातार काम कर रहे हैं:
- एलपीजी और क्रूड ऑयल सप्लाई: इनकी आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत रखना।
- उर्वरकों (Fertilizers) की व्यवस्था: किसानों के लिए गोबर की कमी न हो, यह सुनिश्चित करना।
- खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा: हजारों भारतीयों को वहां से निकालने की योजनाओं को अपडेट करना।
- आर्थिक आकलन: संकट के दौरान रुपये के भाव (Exchange Rate) को कैसे संभाला जाए।
सरकार चाहती थी कि विपक्ष को पूरी जानकारी मिले। जब विपक्ष के पास डेटा होता है, तो वह बेहतर प्रश्न पूछ सकता है। यही कारण था कि सभी सदनों के नेताओं को 'इन द लूप' ले लिया गया।
विपक्ष का रुख और प्रश्न उठना
हमेशा की तरह, विपक्ष ने भी अपने मतदान का रिकॉर्ड साफ़ किया। उन्होंने कहा कि ऐसी गंभीर बैठक में अगर पीएम नहीं हैं, तो क्या इसे नाममात्र की बैठक माना जाए? कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के नेताओं ने जोर दिया कि नरेंद्र मोदी को व्यक्तिगत रूप से शामिल होना चाहिए था। कांग्रेस सांसद अमरिंदर सिंह वड़िंग ने टिप्पणी की, "यदि यह केवल दिखावे के लिए है, तो बेहतर था कि यह टाला जा।"
सीपीआई के महासचिव डी. राजा ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का ज़िक्र करते हुए कहा कि वे हर संकट में सर्वदलीय बैठक बुलाते थे। उनका तर्क था कि संवाद का दरवाज़ा खुला रखना ही लोकतंत्र की प्राणवायु है। विपक्ष ने संसद में मोदी के पहले दिए गए बयान को आधार बनाते हुए मांग उठाई थी कि उन्हें सफलतापूर्वक संवाद करने का अवसर दिया जाए।
इकोनॉमिक और स्ट्रेटेजिक प्रभाव
यह केवल राजनीति नहीं है। यह पैसे और सुरक्षा की बात है। खाड़ी क्षेत्र से हमारा व्यापार बहुत है। अगर वहां युद्ध का माहौल बनता है, तो तेल के भाव छलांग लगा सकते हैं। सरकारी अधिकारियों ने बैठक में आंकड़े दिखाए कि कैसे हम आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को विकल्प खोज रहे हैं। लेकिन विपक्ष का कहना है कि अभी भी जोखिम बहुत है।
साथ ही, भारतीय नागरिकों की समस्या अलग है। लाखों लोग वहां जाकर काम करते हैं। उनके घर वाले यहाँ घर बैठकर चिंतित हैं। किसी बड़ी सुरक्षा चुनौती के सामने लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि देश उनके लिए खड़ा है। यह मानसिक पहलू भी बैठक का हिस्सा था।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
सर्वदलीय बैठक का मुख्य उद्देश्य क्या था?
बैठक का मुख्य उद्देश्य पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के दौरान भारत की ऊर्जा सुरक्षा और वहां मौजूद भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर एक राष्ट्रीय सहमति बनाना था। सरकार चाहा कि विपक्ष को भी अपनी रणनीति और 7 नए गठित समूहों के बारे में पूरी जानकारी दी जाए ताकि सब एकजुट हो सकें।
राहुल गांधी ने इस बैठक में भाग क्यों नहीं लिया?
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी बैठक में शामिल नहीं हो पाए क्योंकि 24 मार्च की रात उनकी माता सोनिया गांधी की तबीयत खराब हो गई थी। इस कारण उन्होंने अपना दिल्ली वापसी यात्रा रद्द करके कांग्रेस के अन्य प्रतिनिधियों को यह बैठक छोड़ दिया।
ऊर्जा संकट से निपटने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं?
सरकार ने विशेष रूप से 7 एंपावर्ड ग्रुप्स का गठन किया है जो एलपीजी, क्रूड ऑयल और उर्वरकों की आपूर्ति को निगरानी कर रहे हैं। ये समूह सुनिश्चित कर रहे हैं कि वैश्विक बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर घरेलू मूल्यों पर कम से कम हो।
विपक्षी दलों ने इस बैठक में क्या मांग की?
विपक्षी दलों, विशेष रूप से कांग्रेस और सीपीआई ने मांग की थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बैठक में स्वयं शामिल होते। उन्होंने कहा कि ऐसा बड़ा राष्ट्रीय संकट के समय सर्वोच्च नेतृत्व की उपस्थिति आवश्यक होती है, जैसे कि अटल बिहारी वाजपेयी जी ने किया करता था।
Krishnendu Nath
मार्च 27, 2026 AT 03:53यह बात बहुत ही सराहनीय है।
pradeep raj
मार्च 28, 2026 AT 17:12यह वास्तव में बहुत ही महत्वपूर्ण घटना है जिसे गंभीरता से देखा जाना चाहिए। ऊर्जा सुरक्षा हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और उस पर ध्यान देना आवश्यक है। पश्चिम एशिया के स्थिर होने पर हमारा भरोसा टूट चुका है और अब सावधानी बरतनी होगी। सरकार ने जो कदम उठाए हैं वे बहुत अच्छे हैं लेकिन निष्पादन पर भी निर्भर करेगा। विपक्ष को भी शामिल करना लोकतंत्र के लिए जरूरी है ताकि सबके हित संरक्षित रहें। हमें इससे आगे की योजना भी देखनी चाहिए ताकि भविष्य के जोखिम कम हों। गल्फ में मौजूद श्रमिकों का हाल जानना और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सबसे पहला काम है। अगर वहां युद्ध हुआ तो भारतीयों को खतरा होगा और उन्हें सुरक्षित निकाला जाना चाहिए। तेल के दाम बढ़ने से आम आदमी प्रभावित होगा और मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। खाद्य पदार्थों की किफायत भी इससे जुड़ी हुई है क्योंकि उर्वरकों की आपूर्ति रुक सकती है। हमें अपनी ऊर्जा स्रोतों को विविध बनाना चाहिए और अन्य देशों से भी सहायता लेनी चाहिए। नए समूहों का काम समय पर होना चाहिए और नियमित रिपोर्टिंग जारी रखनी चाहिए। संवाद का माहौल बनाए रखना भी ज़रूरी है ताकि किसी भी गलतफहमी से बचा जा सके। राजनीतिक मतभेद एक तरफ रखकर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देना सभी पार्टियों का दायित्व है। सभी को मिलकर यह चुनौती का सामना करना चाहिए और मजबूत रणनीति बनानी चाहिए।
Yogananda C G
मार्च 30, 2026 AT 06:02मुझे लगता है कि सब लोग इसे लेकर थोरे चिंतित हैं; हालाँकि सरकार द्वारा ली गई कदम काफी व्यवस्थित लग रहे हैं। ऊर्जा की आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत बनाने के लिए जो समूह बनाए गए हैं उन पर भरोसा होता है। कुछ लोग कहते हैं कि विपक्ष को अधिक जानकारी नहीं मिल रही है, लेकिन मैंने बैठक की रिपोर्ट पढ़ी है। मुझे यकीन है कि अंत में सब ठीक हो जाएगा क्योंकि देश हमेशा अपने लोगों का साथ देता है। हमें इतना डरना नहीं चाहिए जब तक कि तनाव वास्तव में बढ़ न जाए। आशावादी रहना हमेशा अच्छा होता है और इसमें हर कोई सहयोग कर सकता है।
Divyanshu Kumar
मार्च 30, 2026 AT 13:25सर, इस मामले में एक औपचारिकता दिखती है जो बहुत अच्छी है। मैं मानता हुँ कि ऊर्जा सुरक्षा हमारे अर्थव्यवस्था के लिए अतिमहत्वपूर्ण है। कृपया ध्यान दें कि गल्फ क्षेत्र में मौजूद नागरिकों की सुरक्षा प्राथमिकता बननी चाहिए।
Mona Elhoby
मार्च 31, 2026 AT 02:57यहाँ सब कुछ दिखावे जैसा लगे फिर क्या फ़ायदा? सरकार ने बैठक बुलाई है लेकिन असली कार्रवाई कहीं नहीं है। ये सिर्फ प्रचार है और लोगों को भुलाने की कोशिश चल रही है।
Arjun Kumar
अप्रैल 1, 2026 AT 13:59मैं आप से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ क्योंकि कम से कम यह तो किया गया कि सबको सूचना दी गई। कई बार ऐसी स्थिति में शांति बनाए रखना भी एक जीत होती है।
RAJA SONAR
अप्रैल 2, 2026 AT 11:05सबको सोचना चाहिए कि ये लोग क्या कर रहे हैं बस दिखावे के लिए बैठकें होती हैं असली समस्या तो तेल के दाम और गरीबी है
Mukesh Kumar
अप्रैल 3, 2026 AT 07:11लेकिन हमें एक साथ खड़ा होकर समस्या का समाधान खोजना चाहिए और नई रणनीति बनानी चाहिए।
Shraddhaa Dwivedi
अप्रैल 4, 2026 AT 22:06सच्ची बात तो यह है कि हम सबको अपने आप को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी है।
Govind Vishwakarma
अप्रैल 5, 2026 AT 10:09गौर करें कि आंकड़े सच्चाई बताते हैं कि जोखिम अभी भी बराबर है सरकार ने अभी तक कुछ नहीं किया है जो दिख रहा है सिर्फ बैठक है
Jamal Baksh
अप्रैल 6, 2026 AT 02:01हमें विवादों में भाग लेने के बजाय सुधार के प्रति योगदान देना चाहिए और शांति बनाए रखनी चाहिए।
Shankar Kathir
अप्रैल 7, 2026 AT 09:29अक्सर ये गलतफहमियाँ पैदा हो जाती हैं जब तक की कोई स्पष्ट नीति प्रकाशित नहीं होती। मुझे लगता है कि इन समूहों द्वारा काम करने की प्रक्रिया को निगरानी में रखना बेहतर रहेगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाजार के संकेत भी तेजी से बदल सकते हैं। इसलिए सतर्क रहना चाहिए और वैकल्पिक स्रोतों को विकसित करना चाहिए।
Bhoopendra Dandotiya
अप्रैल 8, 2026 AT 12:23कुछ रोचक बातें भी सामने आई हैं कि उर्वरकों की व्यवस्था कैसे प्रभावित होगी।
Firoz Shaikh
अप्रैल 9, 2026 AT 08:29मैं समझता हूँ कि विदेश नीति में सूक्ष्म समझदारी की आवश्यकता होती है और हमें इसे ध्यान से देखना चाहिए। आज के समय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की जटिलता बहुत अधिक हो गई है और हर निर्णय का सीधा प्रभाव होता है। ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा केवल भारत तक सीमित नहीं है बल्कि वैश्विक स्तर पर भी महत्वपूर्ण है। हमें अपनी आर्थिक नीतियों को इस कठिन वातावरण के अनुरूप ढालना पड़ेगा। किसानों की मेहनत का परिणाम यदि बाजार में उतारचढ़ाव से प्रभावित हो तो यह ग्रामीण क्षेत्रों में त्रासदी ला सकता है। इसलिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का सही मूल्यांकन करना हमारी जिम्मेदारी है। विपक्ष की टीकाकार भावनाएं भी समझनी चाहिए क्योंकि यह स्वस्थ बहस का हिस्सा है। सभी राजनीतिक दलों को एक प्लेटफॉर्म पर आकर कार्य करना चाहिए ताकि जनता को सही मार्गदर्शन मिल सके। भारतीयों की सुरक्षा के लिए विशेष ऑपरेशन तैयार किए जाने चाहिए और उनका पता लगाया जाना चाहिए। यह केवल एक बैठक नहीं है बल्कि एक बड़ी रणनीतिक योजना का हिस्सा बनना चाहिए। हमें विश्वास करना चाहिए कि नौकरशाही अपना काम निष्पक्ष रूप से करेगी। लेकिन निगरानी हमेशा नागरिकों की दूर तक होती रहनी चाहिए। अंत में यह सब हमारे विकास की गति पर असर डालेगा इसलिए गंभीरता जरूरी है। हमें अपने आप को संचित जानकारी के आधार पर फैसले लेने के लिए तैयार रखना चाहिए।